Sitam Gar
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सितमगरो का जुल्म इस जहां में हद से ज्यादा जो बड़ गया

सितमगरो

सपना रह गया …
सितमगरो का जुल्म इस जहां में हद से ज्यादा जो बड़ गया
जो ना चाहिए था होना, ना हुआ सदियों में, वोह आज हो गया
तपश बड़ी इतनी ज्यादा इस जहान में, हिमाल्य भी पिघल गया
जाने कब्से इतना प्यासा था समुंदर जो वो हिमाल्य ही निगल गया
उस अमावस की रात इस धरती से उसका चाँद था कही खो गया
भोर भए मालूम हुआ के धरती का चाँद धरती में ही था समा गया
उस बिन चाँद की रात में आज साहिल से उसका सागर खो गया
सुबह मालूम हुआ चाँद के गम में साहिल ही था सागर को पी गया
साहिल उठा बन कर गुबार तो धरती से उसका आसमान खो गया
थमा वोह गुबार तो देखा धरती का आसमान ही धरती को खा गया
धरती का वजूद इस जहान से सदा के लिए था वो गुबार मिटा गया
देख धरती को होते फना सूरज भी अपनी हस्ती भुला पगला गया
धरती के वियोग में सूरज ब्रह्मांड में समा ख़ुद का वज़ूद मिटा गया
बिन चाँद बिन धरती बिन सूरज अब मेरा यहां क्या वजूद रह गया
पूनम की रात उससे मिलने का सपना अब यूई का सपना ही रह गया

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सितमगरो का जुल्म इस जहां में हद से ज्यादा जो बड़ गया
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