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Love Shayri

जानती तूँ भी है के दूर रह कर तुझसे, रहती है रूह बेचैन मेरी

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इश्क-ए-रुबाई …
जानती तूँ भी है के दूर रह कर तुझसे, रहती है रूह बेचैन मेरी
जो तेरी नजर में मिलन की चाह मेरी, है वोही दिल का चैन मेरी

रस्म-ए-वफ़ा की क़समें जितनी शिद्दत से ता-उमर तूने निभाई हैं
हमने भी वफ़ाएँ अपनी चाहतों से उतनी ही शिद्दत से सजाई हैं

मन की डोर अपनी तुमने यूँ ही नही इस दीवाने को थमाई है
तेरे आशिक ने कोसों दूर रह कर भी रस्म-ए-उल्फत निभायी है

यूँ तो अपने इश्क में रिवायतों की ना करी कभी परवाह मैंने
ना हो तेरी रूसवाईयां जमाने में बस इतनी थी करी चाह मैंने

हैं किसी और के नाम का सिंधूर इस जन्म अब तेरे माथे पर
तुमसे मिल भी कैसे अब सकता हूँ अब कौनसे रिश्ते नाते पर

ए इश्क मेरे शायद हो गया हूँ अनजाने में ही गुनहगार तेरा
जानता तूँ भी है के मिलने को है दिल आज भी तलब्गार मेरा

ज़माना यूई की जिन वफाओ की देता है यह कसम-ए-खुदाई
देख मेरे इश्क वोह तो है बस तेरे प्यार से सजी इश्क-ए-रुबाई

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