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घर से निकला हूँ तो निकला है घर भी साथ मेरे

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घर से निकला हूँ तो निकला है घर भी साथ मेरे
देखना ये है कि मंजि़ल पे कौन पहुँचेगा
मेरी क़श्ती में भँवर बाँध के दुनिया खुश है
दुनिया देखेगी कि साहिल पे कौन पहुँचेगा

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जायचा देख के बोला ये नजूमी मुझ से
जो भी माँगा है वो हर हाल में मिल जाएगा
क्या मुबारक है नया साल जो मैं खुश होऊँ
वो जो बिछुड़ा है क्या इस साल में मिल जायेगा?

तेरी दुनिया, तेरी उम्मीद तुझे मिल जाए
चाँद! इस बार तेरी ईद तुझे मिल जाए
जिसकी यादों में चिराग़ों सा जला है शब-भर
उस सहर-रुख़ की कोई दीद तुझे मिल जाए

आँख की छत पे टहलते रहे काले साए
कोई पलकों में उजाले नहीं भरने आया
कितनी दीवाली गईं, कितने दशहरे बीते
इन मुंडेरों पे कोई दीप ना धरने आया

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घर से निकला हूँ तो निकला है घर भी साथ मेरे
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